स्त्रियों पर लिखी एक सुन्दर कविता – स्त्रियाँ कागजों जैसी…

स्त्रियाँ

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कविता

स्त्रियाँ कागजों जैसी होती है!
मोडो.. मुड़ जाती हैं!
जला दो.. जल जाती है!
गला दो.. गल जाती हैं!
फाड़ दो.. फट जाती हैं!

आमतौर पर रद्दी सी या
पुराने अखबारों की तरह
इस्तेमाल की जाती हैं!
चूल्हे में झोक दी जाती है!

पर यदि आता है सलीका
तो कभी सहूलियत से बरतना
विश्वास स्नेह की स्याही से
गढ़ देना शब्द शब्द
कोमल हिय पर.. प्यारे

यह साहित्य बन रामायण, गीता
और कृति अनमोल बन जायेगी
अमर कविता बन तुम्हें गर्व कराएंगी
क्योकि शिशु यदि गढ़ सकती है गर्भ में
तो कालजयी रचनाए भी

तो ब्लैंक चेक भी कागज सा
आप है खाता धारी
जितने स्नेह की नगदी होगी
उतनी कीमत कागज की
कागजात, प्रमाण पत्र, वसीयत, ग्रंथ
उन सबसे भी अनमोल होती है स्त्रियाँ

वैसे सलीके शब्दों के कागज़ पर, अब..
एक नया इतिहास रचेंगे!

-डॉ.मेनका त्रिपाठी

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